Home राज्य समाचार नई दिल्ली ईरान पर अमेरिकी आर्थिक दबाव बढ़ा, भारत के कारोबार पर भी असर...

ईरान पर अमेरिकी आर्थिक दबाव बढ़ा, भारत के कारोबार पर भी असर की आशंका

3
0

भारत-ईरान व्यापार में भारी गिरावट; चाबहार परियोजना और बासमती निर्यात पर बढ़ी चिंता, चार भारतीय कंपनियां अमेरिकी प्रतिबंधों की जद में

नई दिल्ली। ईरान के खिलाफ अमेरिका की ओर से आर्थिक दबाव बढ़ाए जाने के बीच भारत के लिए भी नई चुनौतियां सामने आ रही हैं। अमेरिका ने ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों और कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी है। इसके साथ ही अमेरिकी कार्रवाई के दायरे में कुछ भारतीय कंपनियों के आने से भारतीय कारोबारियों में भी चिंता बढ़ी है।

भारत और ईरान के बीच लंबे समय से राजनयिक और आर्थिक संबंध रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापार में बड़ी गिरावट आई है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार 2018-19 में 17.03 अरब डॉलर से घटकर 2026 में करीब 1.63 अरब डॉलर रह गया है।

ईरानी तेल कारोबार पहले ही हो चुका है कमजोर

भारत कभी ईरानी कच्चे तेल का प्रमुख खरीदार था, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते भारतीय कंपनियों के लिए ईरान से तेल खरीदना मुश्किल हो गया। इसके बाद भारत ने अपनी तेल जरूरतों के लिए रूस समेत अन्य स्रोतों का रुख किया।

अप्रैल 2026 में अमेरिकी प्रतिबंधों में अस्थायी राहत के बाद भारत ने कई वर्षों में पहली बार ईरानी तेल की खरीद दोबारा शुरू की थी। हालांकि, मौजूदा परिस्थितियों में दोनों देशों के बीच व्यापार मुख्य रूप से कृषि उत्पादों और दवाइयों तक सीमित होता जा रहा है।

बासमती चावल के निर्यात पर भी असर

भारत और ईरान के बीच व्यापार में बासमती चावल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारत हर वर्ष बड़ी मात्रा में बासमती चावल ईरान को निर्यात करता है। हालांकि, ईरान संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से माल ढुलाई की लागत और अनिश्चितता बढ़ गई है।

निर्यात कारोबार से जुड़े लोगों के मुताबिक, भुगतान में दिक्कत और माल के रास्ते में अटकने की आशंका के कारण ईरान को होने वाला निर्यात प्रभावित हुआ है। कारोबारियों का कहना है कि व्यापार पूरी तरह बंद नहीं हुआ है, लेकिन पहले की तुलना में इसकी मात्रा काफी कम हो गई है।

चार भारतीय कंपनियां अमेरिकी प्रतिबंधों की जद में

अमेरिकी विदेश विभाग ने ईरानी तेल कारोबार से जुड़े मामले में चार भारतीय कंपनियों और तीन भारतीय नागरिकों पर प्रतिबंध लगाए हैं। अमेरिकी पक्ष के अनुसार, इन कंपनियों ने ईरानी मूल के पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल उत्पादों के आयात या कारोबार में भूमिका निभाई थी।

अमेरिका ने ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ के तहत कार्रवाई करते हुए भारत स्थित कंपनियों के अलावा उनसे जुड़े लोगों को भी प्रतिबंधों के दायरे में लिया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि उसका लक्ष्य ईरानी पेट्रोलियम कारोबार से जुड़े ऐसे नेटवर्क पर कार्रवाई करना है, जिससे ईरान को आर्थिक लाभ पहुंचता है।

चाबहार बंदरगाह भारत के लिए अहम

ईरान के साथ भारत के रणनीतिक हितों में चाबहार बंदरगाह सबसे महत्वपूर्ण परियोजनाओं में शामिल है। भारत ने चाबहार के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के विकास में निवेश किया है। इसका उद्देश्य अफगानिस्तान और मध्य एशियाई बाजारों तक भारत की पहुंच को आसान बनाना है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, ईरान पर बढ़ते प्रतिबंधों का असर चाबहार परियोजना पर भी पड़ सकता है। भारत के लिए यह बंदरगाह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तान के रास्ते मध्य एशिया तक सीधी पहुंच उपलब्ध नहीं है।

चीन पर भी अमेरिकी दबाव

ईरान के साथ आर्थिक संबंधों के मामले में चीन भारत से कहीं अधिक जुड़ा हुआ है। चीन ईरानी तेल का बड़ा खरीदार है और उसने ईरान के साथ कारोबार पर लगाए जा सकने वाले द्वितीयक प्रतिबंधों का विरोध किया है।

चीनी पक्ष का कहना है कि चीन और ईरान के बीच सहयोग अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में है और बाहरी हस्तक्षेप से इसे प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे में अमेरिका की आर्थिक रणनीति का सबसे बड़ा असर चीन के ईरान से जुड़े कारोबार पर पड़ने की संभावना भी जताई जा रही है।

सैन्य संघर्ष के बाद आर्थिक मोर्चे पर बढ़ी चुनौती

ईरान के खिलाफ अमेरिकी आर्थिक दबाव बढ़ने के साथ आने वाले समय में भारत समेत कई देशों की कंपनियों के लिए कारोबार करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर केवल आयात-निर्यात तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि चाबहार जैसे रणनीतिक निवेश और मध्य एशिया तक भारत की व्यापारिक पहुंच पर भी पड़ सकता है।

फिलहाल बड़ा सवाल यही है कि अमेरिका का आर्थिक दबाव ईरान की अर्थव्यवस्था और उसके व्यापारिक साझेदारों को किस हद तक प्रभावित करता है। ईरान पहले ही अमेरिकी आर्थिक कार्रवाई का विरोध करने की बात कह चुका है, जबकि भारत के लिए चुनौती अपने रणनीतिक हितों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बीच संतुलन बनाए रखने की है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here