सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 1,291 पदों में से 601 खाली; ‘यू कोट वी पे’ योजना भी नहीं खींच पा रही डॉक्टरों को, स्वास्थ्य विभाग नई नीति बनाने में जुटा
देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय और दुर्गम क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए अब स्वास्थ्य विभाग विशेषज्ञ डॉक्टरों की भर्ती के लिए आउटसोर्सिंग का सहारा लेने की तैयारी कर रहा है। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी और दूरस्थ क्षेत्रों में तैनाती के बाद उनके लंबे समय तक नहीं रुकने की समस्या से निपटने के लिए नई नीति तैयार की जा रही है। इसके तहत दुर्गम क्षेत्रों के स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा, ताकि स्थानीय लोगों को समय पर उपचार मिल सके और अस्पतालों में उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सके।
प्रदेश में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी लंबे समय से स्वास्थ्य विभाग के सामने चुनौती बनी हुई है। सरकार की ओर से ‘यू कोट वी पे’ योजना के तहत आकर्षक मानदेय देने और दुर्गम क्षेत्रों में तैनात विशेषज्ञ डॉक्टरों को अतिरिक्त भत्ता देने जैसे कदम भी उठाए गए हैं, लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में पद खाली हैं।
विशेषज्ञ डॉक्टरों के 601 पद खाली
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के कुल 1,291 पद स्वीकृत हैं। इनमें से 601 पद खाली चल रहे हैं। इस वजह से कई अस्पतालों में मरीजों को विशेषज्ञ उपचार के लिए दूसरे अस्पतालों या हायर सेंटरों का रुख करना पड़ता है।
विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती और उनकी उपलब्धता बनाए रखना है। ‘यू कोट वी पे’ योजना के तहत विशेषज्ञ डॉक्टरों को अधिकतम छह लाख रुपये प्रतिमाह तक मानदेय देने का प्रावधान बताया गया है, लेकिन निजी अस्पतालों में अधिक वेतन मिलने के कारण सरकारी व्यवस्था में डॉक्टरों को आकर्षित करना मुश्किल हो रहा है।
कई विशेषज्ञताओं में बड़ी संख्या में पद रिक्त
स्वास्थ्य विभाग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, विभिन्न विशेषज्ञताओं में रिक्त पदों की स्थिति इस प्रकार है:
- सर्जन: 144 स्वीकृत पदों में से 70 खाली।
- विशेषज्ञ फिजिशियन: 182 पदों में से 130 खाली।
- एनेस्थीसिया विशेषज्ञ: 181 पदों में से 94 खाली।
- बाल रोग विशेषज्ञ: 160 पदों में से 85 खाली।
- स्त्री रोग विशेषज्ञ: 175 पदों में से 102 खाली।
- मनोचिकित्सक: 29 पदों में से 20 खाली।
- फॉरेंसिक विशेषज्ञ: 25 पदों में से 23 खाली।
- चर्म रोग विशेषज्ञ: 35 पदों में से 28 खाली।
- पब्लिक हेल्थ विशेषज्ञ: 97 पदों में से 67 खाली।
इन रिक्तियों का असर खास तौर पर उन क्षेत्रों में दिखाई देता है, जहां विशेषज्ञ उपचार की सुविधा सीमित है और मरीजों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
अतिरिक्त भत्ता देने के बावजूद नहीं बढ़ी रुचि
दुर्गम क्षेत्रों में डॉक्टरों को तैनात करने और वहां सेवाएं देने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से स्वास्थ्य विभाग ने वर्ष 2024 में कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में काम करने वाले विशेषज्ञ डॉक्टरों को 50 प्रतिशत अतिरिक्त भत्ता देने का निर्णय लिया था। इसके अलावा ‘यू कोट वी पे’ योजना के तहत भी विशेषज्ञों और सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों को आकर्षक मानदेय देने की व्यवस्था की गई। हालांकि, इन प्रयासों के बावजूद डॉक्टरों की कमी पूरी तरह दूर नहीं हो पाई।
अब विभाग आउटसोर्सिंग के माध्यम से विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध कराने की नीति तैयार कर रहा है। इसका उद्देश्य जरूरत वाले अस्पतालों में डॉक्टरों की तैनाती कर स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना है।
आउटसोर्सिंग से डॉक्टर उपलब्ध कराने की नीति बन रही: स्वास्थ्य सचिव
स्वास्थ्य सचिव विनय शंकर पांडेय के अनुसार, प्रदेश के हर जिले में मेडिकल कॉलेज खोलने का लक्ष्य रखा गया है। पिथौरागढ़ और रुद्रपुर मेडिकल कॉलेज को मान्यता मिलने के साथ किच्छा स्थित एम्स के सैटेलाइट सेंटर में अगले महीने ओपीडी शुरू होने की उम्मीद है।
उन्होंने स्वीकार किया कि मेडिकल मानव संसाधन की उपलब्धता, विशेषकर दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, एक चुनौती है। इसे दूर करने के लिए नई नीति तैयार की जा रही है, जिसके तहत आउटसोर्सिंग के माध्यम से अच्छे डॉक्टर उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाएगा।
वॉक-इन इंटरव्यू से भी भर्ती की कोशिश
स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल ने बताया कि पर्वतीय क्षेत्रों में तैनात विशेषज्ञ डॉक्टरों को 50 प्रतिशत अतिरिक्त वेतन देने की व्यवस्था है। ‘यू कोट वी पे’ योजना के तहत विशेषज्ञ और सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों को करीब 5.75 लाख रुपये प्रतिमाह तक मानदेय देने का प्रावधान भी बताया गया है।
उन्होंने कहा कि डॉक्टरों की नियुक्ति के लिए मेडिकल कॉलेजों में साप्ताहिक वॉक-इन इंटरव्यू आयोजित किए जाते हैं। इसके अलावा डीजी हेल्थ कार्यालय में हर महीने दूसरे और आखिरी मंगलवार को भी वॉक-इन इंटरव्यू के माध्यम से चयन की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
रेफर करने की मजबूरी से बढ़ती हैं मरीजों की मुश्किलें
पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौती केवल डॉक्टरों की कमी तक सीमित नहीं है। कई दूरस्थ अस्पतालों में जरूरी संसाधनों और विशेषज्ञ सुविधाओं का अभाव भी मरीजों के लिए परेशानी का कारण बनता है। प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त डॉक्टर या उपचार सुविधाएं उपलब्ध न होने पर मरीजों को हायर सेंटर रेफर करना पड़ता है।
दूरियां अधिक होने, खराब सड़कों और परिवहन संबंधी समस्याओं के कारण मरीजों को बड़े अस्पतालों तक पहुंचने में कई घंटे लग जाते हैं। गंभीर मामलों में यह देरी जोखिम बढ़ा सकती है। ऐसे में आउटसोर्सिंग के जरिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने की प्रस्तावित नीति से उम्मीद की जा रही है कि दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूती मिलेगी। हालांकि, इसका वास्तविक असर नीति लागू होने और अस्पतालों में डॉक्टरों की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित होने के बाद ही स्पष्ट होगा।










