महाराष्ट्र एफडीए के सर्वे में सामने आया बड़ा अंतर, मेडिकल उपकरणों के लिए पारदर्शी मूल्य निर्धारण नीति की मांग
नई दिल्ली। अस्पताल में भर्ती मरीजों के लिए इस्तेमाल होने वाले आईवी सेट, सिरिंज, कैथेटर और अन्य मेडिकल कंज्यूमेबल्स की खरीद कीमत और उनके छपे एमआरपी के बीच भारी अंतर सामने आया है। महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के हालिया सर्वे में कई ऐसे मामले मिले, जहां अस्पतालों द्वारा खरीदे गए मेडिकल उपकरणों पर खरीद कीमत से कई गुना अधिक एमआरपी दर्ज था।
महाराष्ट्र एफडीए के कमिश्नर तुकाराम मुंढे के नेतृत्व में मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन, पुणे और छत्रपति संभाजीनगर के अस्पतालों में किए गए सर्वे के दौरान भर्ती मरीजों के इलाज में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की कीमतों की जांच की गई। सर्वे में 11.05 रुपये में खरीदे गए एक आईवी इन्फ्यूजन सेट पर 325 रुपये का एमआरपी दर्ज मिला। इसी तरह 6.75 रुपये की लागत वाली 10 एमएल सिरिंज पर 57.20 रुपये और 29.41 रुपये में खरीदे गए कैथेटर पर 310 रुपये का एमआरपी पाया गया।
सर्वे के मुताबिक करीब 40 रुपये में खरीदे गए एक नेबुलाइजर पर 650 रुपये तथा लगभग 45 रुपये में खरीदे गए ऑक्सीजन-मास्क से जुड़े उत्पाद पर करीब 715 रुपये का एमआरपी दर्ज था। इन उदाहरणों में खरीद कीमत और एमआरपी के बीच अंतर कई गुना रहा।
मेडिकल उपकरणों के लिए मूल्य नीति की मांग
एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री (AiMeD) ने महाराष्ट्र एफडीए की कार्रवाई का स्वागत करते हुए मेडिकल उपकरणों के लिए पारदर्शी मूल्य निर्धारण नीति की मांग की है। AiMeD के फोरम को-ऑर्डिनेटर राजीव नाथ के अनुसार, कारोबार के लिए उचित मुनाफा जरूरी है, लेकिन अत्यधिक मार्जिन पर नियंत्रण होना चाहिए।
उन्होंने मांग की कि घरेलू उत्पादों के लिए फैक्ट्री कीमत और आयातित उपकरणों के लिए आयात लागत के आधार पर ट्रेड मार्जिन की पारदर्शी सीमा तय की जाए। उद्योग संगठन का कहना है कि मूल्य निर्धारण का असर मरीजों के खर्च के साथ-साथ घरेलू विनिर्माण, अनुसंधान और मेडिकल-डिवाइस क्षेत्र में निवेश पर भी पड़ता है।
मौजूदा नियमों में सीमित मूल्य नियंत्रण
ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO), 2013 के तहत सरकार को दवाओं और कुछ अधिसूचित मेडिकल उपकरणों की कीमतों को नियंत्रित करने का अधिकार है। नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) कीमतों और उपलब्धता की निगरानी करती है।
कुछ चुनिंदा मेडिकल उपकरणों पर ट्रेड-मार्जिन नियंत्रण लागू है। इनमें पल्स ऑक्सीमीटर, नेबुलाइजर, ग्लूकोमीटर, बीपी मॉनिटर, डिजिटल थर्मामीटर और ऑक्सीजन कंसंट्रेटर शामिल हैं। DPCO के पैरा 19 के तहत असाधारण परिस्थितियों और जनहित में सरकार किसी दवा या मेडिकल उपकरण की कीमत निर्धारित कर सकती है।
हालांकि, अन्य कंज्यूमेबल मेडिकल उपकरणों में वास्तविक खरीद लागत और मरीज से वसूली जाने वाली अंतिम कीमत के बीच अंतर को लेकर सवाल उठ रहे हैं। उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि केवल एमआरपी की निगरानी पर्याप्त नहीं है, बल्कि मूल्य निर्धारण की पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी है।
2018 से अब तक 24 ओवरचार्जिंग शिकायतें
सरकारी जानकारी के अनुसार वर्ष 2018 से अब तक NPPA को मेडिकल उपकरणों पर निर्धारित कीमत से अधिक वसूली से संबंधित 24 शिकायतें मिली हैं। इसके अलावा मेडिकल उपकरणों की कमी से जुड़ी 10 शिकायतें दर्ज हुई हैं। विभाग के अनुसार शिकायतों का विश्लेषण कर आवश्यकतानुसार संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए जाते हैं और कीमतों की निगरानी लगातार की जाती है।
सरकार ने उपभोक्ताओं में मूल्य नियंत्रण संबंधी जागरूकता बढ़ाने के लिए ‘प्राइस मॉनिटरिंग एंड रिसोर्स यूनिट्स’ तथा ‘कंज्यूमर अवेयरनेस, पब्लिसिटी एंड प्राइस मॉनिटरिंग’ (CAPPM) जैसी व्यवस्थाएं भी लागू की हैं।
2030 तक 50 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान
भारत का मेडिकल-डिवाइस बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है। वर्ष 2030 तक इसके करीब 50 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। फिलहाल देश की मेडिकल उपकरणों से जुड़ी करीब 70 से 80 प्रतिशत जरूरतों और बिक्री में आयात की बड़ी हिस्सेदारी है।
घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने मेडिकल डिवाइस पीएलआई योजना और मेडिकल डिवाइस पार्क्स जैसी योजनाएं शुरू की हैं। पीएलआई योजना के लिए वित्त वर्ष 2020-21 से 2027-28 तक 3,420 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार योजना के तहत 26 कंपनियों को मंजूरी दी गई है। इनमें करीब 1,330.44 करोड़ रुपये के निवेश की प्रतिबद्धता जताई गई है और लगभग 7,950 रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है। वहीं 36 उत्पादों से जुड़े 14 मैन्युफैक्चरिंग प्लांट चालू किए जा चुके हैं।
मेडिकल डिवाइस पार्क्स योजना के तहत उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में प्रस्तावित पार्कों के लिए प्रति पार्क 100 करोड़ रुपये तक की वित्तीय सहायता का प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य साझा टेस्टिंग, प्रयोगशाला और अनुसंधान सुविधाएं विकसित कर घरेलू मेडिकल-डिवाइस विनिर्माण को बढ़ावा देना है।










